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एक अनूठे भिक्षावृत्ति उत्सव का इंद्राना में हुआ शुभारंभ भीखमंगाई नहीं है भिक्षावृत्ति!


जबलपुर के जीविका आश्रम में देश के विभिन्न राज्यों से 25 भिक्षावृत्ति मंडलियाँ का हुआ समागम


(विशिष्ट कारीगर बाजार (सरोता, पीतल, कुम्हारी, पट चित्र, इत्यादि) | 15+ विशेषज्ञ | 100+ प्रतिभागी

जबलपुर। 27 दिसंबर 2024 को जबलपुर के पास जीविका आश्रम में देशभर और विशेष रूप से मध्य भारत के भिक्षावृत्ति समुदाय के बचे हुए कलाकारों को एक मंच देने के लिए ‘भिक्षावृत्ति उत्सव’ का भव्य उद्घाटन हुआ।

जुलूस और कारीगर यंत्र

कार्यक्रम का शुभारंभ एक शोभा यात्रा से हुआ, जिसमें भिक्षावृत्ति समूह, कारीगर और प्रतिभागियों का बड़ा जमावड़ा जीविका आश्रम से इंद्राणा के बर्रा मंदिर की ओर निकला। जुलूस में स्थानीय लोगों ने भी जमकर भाग लिया। जुलूस, अंत में जीविका आश्रम के पारंपरिक 'कारीगर यंत्र' पर आकर रुका। इसी कारीगर यंत्र पर दीप प्रज्वलन से उत्सव का उद्घाटन हुआ।आश्रम के प्रमुख प्रेरणा स्रोत स्वर्गीय रविन्द्र शर्मा जी का स्मरण किया गया।

चर्चा सत्र

कार्यक्रम के प्रथम दिन दो चर्चा सत्र आयोजित हुए। भिक्षावृत्ति के संदर्भ से लोग इतने दूर हो गए हैं कि हम भिक्षावृति को भिखारी ही समझने लगे हैं। यह हमारे पूर्वाग्रह की सीमा है। स्वर्गीय गुरुजी रविंद्र शर्मा हमेशा कहते थे कि स्मृति जागरण बहुत जरूरी है। इसलिए पहला चर्चा सत्र भिक्षावृत्ति के परिचय पर रहा। दिल्ली के आर्यमन जैन ने इस सत्र का संचालन किया। सत्र के वक्ता और अतिथि रहे: श्रीमती राजश्री शर्मा जी (सह संस्थापक, कला आश्रम, आदिलाबाद), श्री बाल कृष्ण रेणके (संस्थापक, सामाजिक विकास अनुसंधान संस्थान, सोलापुर), सेवानिवृत्त प्रो. जयधीर तिरुमल राव जी (तेलुगु विश्वविद्यालय, हैदराबाद), श्री गोपीकृष्ण (घुमंतू एवं चरवाहा समाज विशेषज्ञ, बेलगाम) और श्री आशीष गुप्ता (संस्थापक, जीविका आश्रम, जबलपुर)। श्री आशीष गुप्ता जी ने भिक्षावृत्ति के परिचय से सत्र की शुरुआत की।

सेवानिवृत्त प्रो. जयधीर तिरुमल राव जी ने बात पर लगातार जोर दिया कि इन भिक्षावृति समूह को केवल कलाकार या रंगकर्मी कहना ठीक नहीं होगा। यह उनके इतिहास को सीमित कर देता है। यह बात जरूर है कि उनके काम में सौंदर्य और कलाकारी भरपूर मात्रा में दिखती है, लेकिन उनका काम केवल मनोरंजन करना नहीं था। वे ज्ञान की बातें, झगड़े सुलझाना, संदेश पहुंचाने जैसे काम सहज ही कर लिया करते थे।

उन्होंने बताया, "भिक्षावृत्ति समूह के साथ एक बड़ी समस्या यह भी है कि उनका कोई स्थायी निवास या स्थान नहीं होता। वे अपने यजमानों के यहां कहानियां सुनाने जाते हैं। उनकी पहचान अपनी जाति से जुड़ी हुई है। सरकार भी उन्हें अनपढ़–गवार समझती है और उन्हें शिक्षित करना चाहती है।" ऐसा कहते हुए तिरुमल राव जी ने सालों पुराने पटचित्र और तांबे के बर्तन दिखाए, जिसपर इन्हीं अनपढ़ लोगों ने विस्तृत लिखाई की हुई थी। इन समूहों को किसी खांचे में आंटने से पहले हमें थोड़ा सोचना चाहिए।

इस सत्र के अंत में वासुदेव भिक्षावृत्ति समुदाय ने प्रदर्शन किया।

दूसरा सत्र भिक्षावृत्ति के कला में योगदान पर था। सत्र का संचालन श्री अमित कोहली जी ने किया। अमित कोहली प्रकाश आमटे जी के साथ घरचीरोली, महाराष्ट्र में आदिवासी समूह के साथ शिक्षा विकास पर काम करते हैं। इस सत्र के वक्ता रहे: सेवानिवृत्त प्रो. जयधीर तिरुमल राव जी (तेलुगु विश्वविद्यालय), श्री सुमनस्पति रेड्डी (पूर्व स्टेशन निदेशक, आकाशवाणी), श्री संतोष द्विवेदी (अध्यक्ष, मध्यप्रदेश गांधी स्मारक निधि) और नरेंद्र बहादुर (अध्येता, लेखक और रंगकर्मी)।

सत्र में प्रतिभागियों के लिए यह बात साफ हुई कि भिक्षावृत्ति केवल भीखमंगाई नहीं है। सुमनस्पति जी ने बताया, "आज की भिक्षा और पुरानी भिक्षा व्यवस्था में बहुत अंतर है। पहले की व्यवस्था व्यवस्थित थी। उस समाज का किसी ऐसी व्यवस्था की जरूरत दिखी होगी, जहां असल समृद्धि निर्लिप्तता में देखी जाये।"


इस सत्र के अंत में थोटी समुदाय ने प्रदर्शन किया।

लोक–कला प्रदर्शन

दिन के अंत में देश के विभिन्न राज्यों से पधारे लगभग 10 भिक्षावृत्ति समूहों ने अपनी अपनी भिक्षावृत्ति कला का प्रदर्शन किया। हालांकि, लोग पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान इत्यादि जैसी विविध जगहों से आए थे, लेकिन भाषा कभी बाधा नहीं बनी। उल्टा इस विविध यजमानी प्रथा की झलक सहज ही देखने को मिली। राजस्थान से लंगा, पश्चिम बंगाल से पटचित्र चित्रकार, तेलंगाना से रूंजा कथा, बैंदल कथा, वीरनालू, जमदिकालु, महाराष्ट्र से बहरूपिए और मध्यप्रदेश से दुल दुल घोड़ी, ढोल पार्टी ने प्रदर्शन किया।

आज से ही स्थानीय कारीगरों ने अपने अपने स्टाल सुसज्जित कर लिए हैं। इसमें गोंड चित्रकारी, पटचित्र चित्रकारी, सरोता, पीतल, इत्यादि शामिल हैं। साथ ही, बांस, पारंपरिक रसोई, भिक्षावृत्ति प्रारूपों की तीन भव्य प्रदर्शनी भी आयोजित की गयी है।

उत्सव में लगभग 100 भिक्षावृत्ति अभ्यासकर्ताओं के साथ साथ 200 से ज्यादा प्रतिभागियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। साथ ही बड़ी संख्या में स्थानीय इंद्राना एवं जबलपुर वासी शामिल हुए।

जीविका आश्रम: एक पहल

'जीविका आश्रम' इस तरह के ढेरों प्रयोग करने में देश भर में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। अपनी स्थापना के कुछ ही वर्षों में, जीविका आश्रम अपने इन कार्यक्रमों में देश-विदेश के लोगों को आकर्षित करने में सफल रहा है। जानने योग्य एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जीविका आश्रम के ये सारे कार्यक्रम आपसी सहयोग से ही आयोजित किये जा रहे हैं। जीविका आश्रम, जबलपुर के एक दम्पत्ति श्री आशीष गुप्ता एवं श्रीमति रागिनी गुप्ता की एक पहल है।

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